Sunday, December 30, 2007
बच्चन जी की तेजी से पहली मुलाक़ात
चाय आ जाती है तो वे प्रेमा से कहते है तेजी को भी आवाज दे दो जाग गई होगी यह नाम प्रकास के घर में पहली बार सुनता हूँ मुझे बताया जाता है की तेजी मिस तेजी सूरी है फतेह चंद कालेज लाहौर में सैकोलोजी padati हैं जहाँ प्रेमा principal होकर गई हैं प्रेमा लाहौर मे इन्ही के साथ रहती थी बडे दिन की छुत्तियो मे प्रेमा बरेली आने लगी तो तेजी को साथ लाई साथ के इतने मी एक पल्ला !
itne me दरवाजा का ek palla धीमे से खुलता हैं और मिस सूरी कमरे मी प्रवेश करती हैं मुस्कराती, मझोले कद की, इकहरे बदन की , गौर वर्ड की, चेहरा अंडाकार, आखें बड़ी , नाक लंबी, होठ न bharen पतले , दांत चमकीले, और बिल्कुल ग्रीक महिला का सा मुख उन्होने अपने चेहरे को चारो तरफ से एक स्याह पतली चुन्नी लपेट रक्खी थी और्जिसमे उनके चेहरे का गौर वर्ड निखर उठता था आंखो मे नीद की नरमी अभी अटकी- अटकी उन्होने फल्सी रंग की सलवार - कमीज पहन रक्खी थी और जल्दी मे कोई उनी कोट दाल लिया था उनके कमरे मे परवेश करते ही मैं उठ कर खडा हो गया प्रेमा ने उनका परिचय दिया 'मेरी सहेली तेजी' प्रकाश ने मेरा परिचय दिया 'मेरे MITRA बच्चन ' उनका रूप प्रथम DRISTI मे किसी को भी अभिभूत करने को प्रयाप्त था फ़िर सब लोगो मिल कर चाय पी और चाय पर ही प्रकाश ने अपनी कुछ प्रिय कविताएं सुनने की जिद की तो मैं सुनाया और मिस सूरी पर क्या प्रभाव हुआ शायद ही मैं ने जानना चाहा !
itne me दरवाजा का ek palla धीमे से खुलता हैं और मिस सूरी कमरे मी प्रवेश करती हैं मुस्कराती, मझोले कद की, इकहरे बदन की , गौर वर्ड की, चेहरा अंडाकार, आखें बड़ी , नाक लंबी, होठ न bharen पतले , दांत चमकीले, और बिल्कुल ग्रीक महिला का सा मुख उन्होने अपने चेहरे को चारो तरफ से एक स्याह पतली चुन्नी लपेट रक्खी थी और्जिसमे उनके चेहरे का गौर वर्ड निखर उठता था आंखो मे नीद की नरमी अभी अटकी- अटकी उन्होने फल्सी रंग की सलवार - कमीज पहन रक्खी थी और जल्दी मे कोई उनी कोट दाल लिया था उनके कमरे मे परवेश करते ही मैं उठ कर खडा हो गया प्रेमा ने उनका परिचय दिया 'मेरी सहेली तेजी' प्रकाश ने मेरा परिचय दिया 'मेरे MITRA बच्चन ' उनका रूप प्रथम DRISTI मे किसी को भी अभिभूत करने को प्रयाप्त था फ़िर सब लोगो मिल कर चाय पी और चाय पर ही प्रकाश ने अपनी कुछ प्रिय कविताएं सुनने की जिद की तो मैं सुनाया और मिस सूरी पर क्या प्रभाव हुआ शायद ही मैं ने जानना चाहा !
Friday, December 28, 2007
मधुशाला
श्री हरवंश राय बच्चन कृत मधुशाला .-.हिन्दी कविता
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा, फ़िर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत, करती मेरी मधुशाला. १
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूणर् निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं, तुझपर जग की मधुशाला. २
भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण- भर ख़ाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला. ३
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
' किस पथ से जाऊँ? ' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग- अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ -
' राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला.' ४
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
' दूर अभी है ' , पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढ़ूँ आगे, साहस है न फ़िरूँ पीछे,
किंकतर्व्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला. ५
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला. ६
मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते- करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला. ७
हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला. ८
Saturday, September 22, 2007
नाम करने से ज्यादा महत्वपूर्ण भले काम करना
मनुष्य की चिरंजीवी बनने और अपने नाम को स्थापित करने की बड़ी इच्छा होती है, परंतु नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है भले काम करना।
इसी संदर्भ में एक प्राचीन कथा इस प्रकार है- चक्रवर्ती सम्राट भरत की धारणा थी कि वे पूरी धरती के पहले चक्रवर्ती राजा हैं कम से कम इस विषय में तो पहले हैं ही कि वृषभाचल पर्वत पर पहुँच सके हैं।
वे उस पर्वत-शिखर पर अपना नाम अंकित करना चाहते थे। उनकी यह भी मान्यता थी कि पर्वत पर उनका पहला नाम होगा।
जब वे पर्वत-शिखर पर पहुँचे तो ठिठक गए। उन्होंने देखा, जहाँ तक दृष्टि जाती है, पर्वत पर सभी दिशाओं में हर कोने में नाम लिखे हैं। इतने नाम कि कोई स्थान भरत को अपना नाम लिखने के लिए रिक्त नहीं दिखाई पड़ा।
उन्होंने यह भी देखा कि जो नाम लिखे हैं उनमें ऐसा एक भी नाम न था जो चक्रवर्ती या चक्रवर्ती के तुल्य न हो। तब वे खिन्न होकर एक नाम मिटा देते हैं। उस स्थान पर स्वयं का नाम लिखा और अपने राज्य लौट आए।
जब उन्होंने इस घटना की चर्चा राजपुरोहित से की तो राजपुरोहित आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा- राजन्, अपने नाम को अमर रखने का आधार ही आपने नष्ट कर दिया। अब तो आपने नाम मिटाकर नया नाम लिखने की परंपरा शुरू कर दी। जहाँ आपने अपना नाम लिखा है, वहाँ कभी कोई आपका नाम काटकर या मिटाकर स्वयं का नाम लिख देगा।
राजपुरोहित की बात सुनकर भरत को अनुमान हुआ कि नाम से कुछ नहीं होता। जहाँ जाओ, अनगिनत नाम लिखे हैं। और तो और नाम मिटाने में भी किसी को कोई संकोच नहीं होता। जबकि इन अनगिनत नामों को न कोई देखने वाला है, न कोई याद रखने वाला है।
अच्छा तो यह हो कि लोग नाम के मोह में न पड़कर भले काम की ओर प्रवृत्त हों। दरअसल हम सभी में अपने नाम को स्थापित और चिरंजीवी बनाने की बड़ी इच्छा होती है, परंतु महापुरुषों का कहना है कि नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है भले काम करना।
इसी संदर्भ में एक प्राचीन कथा इस प्रकार है- चक्रवर्ती सम्राट भरत की धारणा थी कि वे पूरी धरती के पहले चक्रवर्ती राजा हैं कम से कम इस विषय में तो पहले हैं ही कि वृषभाचल पर्वत पर पहुँच सके हैं।
वे उस पर्वत-शिखर पर अपना नाम अंकित करना चाहते थे। उनकी यह भी मान्यता थी कि पर्वत पर उनका पहला नाम होगा।
जब वे पर्वत-शिखर पर पहुँचे तो ठिठक गए। उन्होंने देखा, जहाँ तक दृष्टि जाती है, पर्वत पर सभी दिशाओं में हर कोने में नाम लिखे हैं। इतने नाम कि कोई स्थान भरत को अपना नाम लिखने के लिए रिक्त नहीं दिखाई पड़ा।
उन्होंने यह भी देखा कि जो नाम लिखे हैं उनमें ऐसा एक भी नाम न था जो चक्रवर्ती या चक्रवर्ती के तुल्य न हो। तब वे खिन्न होकर एक नाम मिटा देते हैं। उस स्थान पर स्वयं का नाम लिखा और अपने राज्य लौट आए।
जब उन्होंने इस घटना की चर्चा राजपुरोहित से की तो राजपुरोहित आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा- राजन्, अपने नाम को अमर रखने का आधार ही आपने नष्ट कर दिया। अब तो आपने नाम मिटाकर नया नाम लिखने की परंपरा शुरू कर दी। जहाँ आपने अपना नाम लिखा है, वहाँ कभी कोई आपका नाम काटकर या मिटाकर स्वयं का नाम लिख देगा।
राजपुरोहित की बात सुनकर भरत को अनुमान हुआ कि नाम से कुछ नहीं होता। जहाँ जाओ, अनगिनत नाम लिखे हैं। और तो और नाम मिटाने में भी किसी को कोई संकोच नहीं होता। जबकि इन अनगिनत नामों को न कोई देखने वाला है, न कोई याद रखने वाला है।
अच्छा तो यह हो कि लोग नाम के मोह में न पड़कर भले काम की ओर प्रवृत्त हों। दरअसल हम सभी में अपने नाम को स्थापित और चिरंजीवी बनाने की बड़ी इच्छा होती है, परंतु महापुरुषों का कहना है कि नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है भले काम करना।
हिन्दुसतान
एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है ,
आज शायर , ये तमाशा देखकर हैरान है।
खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ,
ये हमारे वक्त की सबसे सही पहचान हैं ।
एक बूड़ा आदमी है मुल्क में या कहो -
इस अधेंरी कोठरी में एक रौशंदान है ।
मसलहत आमेज होते हैं सीयासत के कदम ,
तू ना समझेगा सीयासत तू अभी इन्सान है ।
इस क़दर पाबंदी -ये-मजहब की सदके आपके ,
जब से आजादी मिली है मुल्क में रमजान है ।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुये ,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुसतान हैं ।
मुझमे रहते हैं करोडो लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयां है ।
आज शायर , ये तमाशा देखकर हैरान है।
खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ,
ये हमारे वक्त की सबसे सही पहचान हैं ।
एक बूड़ा आदमी है मुल्क में या कहो -
इस अधेंरी कोठरी में एक रौशंदान है ।
मसलहत आमेज होते हैं सीयासत के कदम ,
तू ना समझेगा सीयासत तू अभी इन्सान है ।
इस क़दर पाबंदी -ये-मजहब की सदके आपके ,
जब से आजादी मिली है मुल्क में रमजान है ।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुये ,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुसतान हैं ।
मुझमे रहते हैं करोडो लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयां है ।
जीकर
चांदनी छत पे चल रही होगी ,
अब अकेली टहल रही होगी ।
फ़िर मेरा जीकर आ गया होगा ,
वो बरफ-सी पीघल रही होगी ।
कल का सपना बहुत सुहाना था ,
ये उदासी न कल रही होगी ।
सोचता हूँ की बंद कमरे में ,
एक शमा -सी जल रही होगी ।
अब अकेली टहल रही होगी ।
फ़िर मेरा जीकर आ गया होगा ,
वो बरफ-सी पीघल रही होगी ।
कल का सपना बहुत सुहाना था ,
ये उदासी न कल रही होगी ।
सोचता हूँ की बंद कमरे में ,
एक शमा -सी जल रही होगी ।
Friday, September 21, 2007
नशा
प्यार एक नशा हैं, पड़ना एक नशा हैं, घूमना एक नशा हैं, बाते करना एक नशा हैं, डायरी मे अपने वीचार लीखना एक नशा हैं, कीसी को चाहना एक नशा है, दोस्ती करना भी एक नशा हैं, लोगो के सामने अपने वीचार प्रकट करना एक नशा हैं, नशा का मतलब दारू नही हैं, नशा का मतलब जूनून होता हैं या लगन होती हैं या कीसी काम को पुरा करना एक नशा होता हैं ,
मैं क्या हूँ
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