Saturday, September 22, 2007

नाम करने से ज्यादा महत्वपूर्ण भले काम करना

मनुष्य की चिरंजीवी बनने और अपने नाम को स्थापित करने की बड़ी इच्छा होती है, परंतु नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है भले काम करना।

इसी संदर्भ में एक प्राचीन कथा इस प्रकार है- चक्रवर्ती सम्राट भरत की धारणा थी कि वे पूरी धरती के पहले चक्रवर्ती राजा हैं कम से कम इस विषय में तो पहले हैं ही कि वृषभाचल पर्वत पर पहुँच सके हैं।

वे उस पर्वत-शिखर पर अपना नाम अंकित करना चाहते थे। उनकी यह भी मान्यता थी कि पर्वत पर उनका पहला नाम होगा।

जब वे पर्वत-शिखर पर पहुँचे तो ठिठक गए। उन्होंने देखा, जहाँ तक दृष्टि जाती है, पर्वत पर सभी दिशाओं में हर कोने में नाम लिखे हैं। इतने नाम कि कोई स्थान भरत को अपना नाम लिखने के लिए रिक्त नहीं दिखाई पड़ा।

उन्होंने यह भी देखा कि जो नाम लिखे हैं उनमें ऐसा एक भी नाम न था जो चक्रवर्ती या चक्रवर्ती के तुल्य न हो। तब वे खिन्न होकर एक नाम मिटा देते हैं। उस स्थान पर स्वयं का नाम लिखा और अपने राज्य लौट आए।

जब उन्होंने इस घटना की चर्चा राजपुरोहित से की तो राजपुरोहित आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा- राजन्‌, अपने नाम को अमर रखने का आधार ही आपने नष्ट कर दिया। अब तो आपने नाम मिटाकर नया नाम लिखने की परंपरा शुरू कर दी। जहाँ आपने अपना नाम लिखा है, वहाँ कभी कोई आपका नाम काटकर या मिटाकर स्वयं का नाम लिख देगा।

राजपुरोहित की बात सुनकर भरत को अनुमान हुआ कि नाम से कुछ नहीं होता। जहाँ जाओ, अनगिनत नाम लिखे हैं। और तो और नाम मिटाने में भी किसी को कोई संकोच नहीं होता। जबकि इन अनगिनत नामों को न कोई देखने वाला है, न कोई याद रखने वाला है।

अच्छा तो यह हो कि लोग नाम के मोह में न पड़कर भले काम की ओर प्रवृत्त हों। दरअसल हम सभी में अपने नाम को स्थापित और चिरंजीवी बनाने की बड़ी इच्छा होती है, परंतु महापुरुषों का कहना है कि नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है भले काम करना।

हिन्दुसतान

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है ,
आज शायर , ये तमाशा देखकर हैरान है।
खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ,
ये हमारे वक्त की सबसे सही पहचान हैं ।
एक बूड़ा आदमी है मुल्क में या कहो -
इस अधेंरी कोठरी में एक रौशंदान है ।
मसलहत आमेज होते हैं सीयासत के कदम ,
तू ना समझेगा सीयासत तू अभी इन्सान है ।
इस क़दर पाबंदी -ये-मजहब की सदके आपके ,
जब से आजादी मिली है मुल्क में रमजान है ।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुये ,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुसतान हैं ।
मुझमे रहते हैं करोडो लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयां है ।

जीकर

चांदनी छत पे चल रही होगी ,
अब अकेली टहल रही होगी ।
फ़िर मेरा जीकर आ गया होगा ,
वो बरफ-सी पीघल रही होगी ।
कल का सपना बहुत सुहाना था ,
ये उदासी न कल रही होगी ।
सोचता हूँ की बंद कमरे में ,
एक शमा -सी जल रही होगी ।

Friday, September 21, 2007

नशा

प्यार एक नशा हैं, पड़ना एक नशा हैं, घूमना एक नशा हैं, बाते करना एक नशा हैं, डायरी मे अपने वीचार लीखना एक नशा हैं, कीसी को चाहना एक नशा है, दोस्ती करना भी एक नशा हैं, लोगो के सामने अपने वीचार प्रकट करना एक नशा हैं, नशा का मतलब दारू नही हैं, नशा का मतलब जूनून होता हैं या लगन होती हैं या कीसी काम को पुरा करना एक नशा होता हैं ,

मैं क्या हूँ


मैं क्या हूँ कुछ भी तो नही, एक साधारण मनुष्य जो अपनी जीवीका चलाने के लीए छोटी सी नौकरी कर्ता हूँ! और अपने विचारो को एक कापी मे लिखता हूँ जीसके कारण लोग मुझे आवारा, पागल, दीवाना कहते हैं आप भी मुझे कुछ भी कह सकते हो मुझे कोई कष्ट नही होगा , बस आप खुश रहे इसी मे मैं खुश हूँ