चांदनी छत पे चल रही होगी ,
अब अकेली टहल रही होगी ।
फ़िर मेरा जीकर आ गया होगा ,
वो बरफ-सी पीघल रही होगी ।
कल का सपना बहुत सुहाना था ,
ये उदासी न कल रही होगी ।
सोचता हूँ की बंद कमरे में ,
एक शमा -सी जल रही होगी ।
Saturday, September 22, 2007
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